Thursday, May 14, 2015

आबरू बनाम सत्त


              

                   

               .               ‘भूख’ जैसे जटिल शब्द की व्यवहारिक परिभाषा देना अपने आप में एक दुस्कर कार्य है पर स्वानुभूति जरूर इसे सहज बनाने में मदद करती है लेखक ने ‘भूख’ जैसी वेदना अपने मुंबई प्रवास के दौरान सही थी ,जिसका जिक्र इनकी आगे की कृति ‘ये कोठेवालियां’ में भी है शायद इसी के चलते ऐसे विषय को विस्तार देना संभव हुआ .खुद के अनुभव से कहूँ तो कुछ दिन बचपन में और आगे  कॉलेज के दिनों में थोडा बहुत भूखा रहना पड़ा था, जिसके  चलते इसकी समीक्षा करने का दुस्साहस कर पाया . द्वितीय विश्व युद्ध की परछाई तले दुनिया के नक़्शे में भारतवर्ष के बंगाल प्रान्त में जिस साल धान की उपज के  हिसाब से अकाल पड़ने की कोई सम्भावना न थी  वहीँ कुछ शक्तिशाली लोगों द्वारा निर्बलों का निवाला छीन तीसरे ताकतवर से मरने या मारने की हठ  के चलते जो संभव हुआ वही बंग दुर्भिक्ष था . जिसके अनुभव जनित चित्र लेखक की कलम ने खींचे हैं . जहाँ एक तरफ आबरू की खोखली लड़ाई है वहीँ दूसरी तरफ हड्डियों के ढांचे में धंसा पेट . कथा के नायक पांचू मास्टर की ‘कल्पना’ उन्हें दार्शनिकता की गहराइयों में ले जाकर दीमकों तक पर रिसर्च करवा देती है तो उनका ‘प्रत्यक्ष’ उन्हें दुर्भिक्ष के वास्तविक जिम्मेदारों के सामने फूटने से नहीं बचा पाता .
                   ये दुर्भिक्ष ‘भला आबरू के बंधन से भी कभी छूटते हैं ?’ की उक्ति को पांचूमास्टर से  यह कहलवाकर झुटला देता है की ‘आबरू के असत्य से दूर की सलाम रखने वाला सच्चा  जवांमर्द अगर कोई इस देश में मिल सकता है ,तो वह कोई छोटी उम्र का बच्चा ही होगा ,जो भूख लगने की इंसानी कमजोरी के लिए जरा भी लज्जित नहीं ‘ यानि आबरू के बंधन डाले जाते हैं ? या समय सापेक्ष स्वत: पड़ जाते हैं ? जिसे पार्वती माँ के रूप में पिछली पीढ़ी यह कहकर स्वीकार करती है ‘ये तो सच है .किया भी क्या जाये .नंगे की तो दोनों टाँगें उघाड़ी ,तब भी वह किस तरह लाज तो समेटता ही है बेटा !’ क्या इसे केवल अकाल की नियति कहना संगत होगा ?
                  सत्ता के प्रतिनिधि ‘दयाल जमींदार को शराब की एक बूँद तडपा रही थी ,और दयाल की प्रजा को चावल की एक कनी . कैसा विचित्र समय था ‘ हर कोई अपने से इतर नहीं सोच पा रहा था अकाल की मार झेल रहे बंगाल के नरकंकाल केवल क्षुब्ध हैं  ,वे हर रोज आँखों में अन्न का सपना लेकर सोते जागते हैं ,स्त्रियों की दशा बदतर है , मौत बच्चों के साथ खेलती नज़र आती है .इन सब के बीच कंहीं किसी बात पे ‘दो जोड़ी होटों’ पर प्यार भरी मुस्कान की रेखाएं खिंच जाती हैं ,जो भूख में व्रत का अहसास करा पाती हैं ? यही जीवन है ..जो सत्त की लडाई पांचू आखिर तक लड़ता है . स्वयं  पर जोर न चलने के बावजूद वह सारी गलत चीज़ों के लिए सभी जिम्मेदार लोगों को कोसना चाहता है .मन में ही सही कोसता भी है . हर वक्त शारीरिक रूप से उन सभी ताकतों के साथ खड़ा होकर भी उसका आत्मिक तराजू ‘सत्त’ के वजन को भारी पाता है .  
                 पेट की भूखी स्त्री पर हवस का भूखा पुरुष ऐसे भयंकर भूखे समय में जो स्वांग  रचता है उसमें भी उसका दोगलापन भलीभांति नजर आता है .एक तरफ तो  भूखी स्त्री को खाना खिलाकर उसकी ‘आबरू’ से खेलना चाहता है  वहीँ  दूसरी तरफ ‘सत्त’ की रक्षा के लिए आबरू लूटने में शैतान का सहारा लेता है .खुद का पेट काट काट कर अपनी संतान को खिलाने वाली स्त्री जात के चीथड़े-चीथड़े यहाँ उड़ जाते है .जो इस विभित्षिका का चरमोत्कर्ष है .
                इस अकाल ने समूचा मानव विमर्श कर छोड़ा था .’जातियां सिर्फ नाम लेने के लिए रह गयीं हैं . . वर्ण भेद को कोई टके सेर भी नहीं पूछता . हिन्दू –मुसलमान का भेद मानो मिट चुका है . सभी बस भूखे हैं ‘. केवट मोनाई के रूप में नीच जात भी पैसे की ताकत से सबके अनाज पर सांप बनके बैठा है .जो बाज़ार का प्रतिरूप है लोगों के सामान की कीमत खुद तय करता है और बदले में झांसा सिर्फ देता है .पर स्वयं के परिवार को लेकर वह सतर्क है . स्वयं का नीच जात में पैदा होना उसके लिए शाप है इसी के चलते अपने बेटे को पढ़ाना  चाहता है क्योंकि ‘विद्वान् और सरकारी अफसर की जात पुंछ (मिट ) जाती है ‘ आखिर यह समझ उसमें आई कहाँ से ? अपनी जाति को कोसता केवट एक तरफ जहाँ दयाल जमींदार से दबता है वहीँ मोका लगने पर वह पांचू मास्टर के प्राण सुखाने में भी कसर नहीं छोड़ता .
                 राजस्थान के संवत ५६ के अकाल की भी धुंधली करुण तस्वीरें  यहाँ उभरकर ताज़ी हो जाती हैं जिसने लोगों को पेड़ की छालों तक को खाने पर मजबूर कर दिया था .  और भविष्य के लिए भी अपने कालजयी होने के प्रश्न से रूबरू करवाती है जिसका पहला कारण सत्ता बनती है और शिकार आमजन होते हैं . इनके पात्रों ने सोचने में कोई कसर नहीं छोड़ी  आखिर भूखे पेट इस मात्रा में खयाल आए कहाँ से ? कुछेक अतिरेकों से यदि बचा जाता तो विषय के साथ पूर्ण न्याय हो पाता खेर आज जब जमाना ‘गुडड.. मानी... डेमफूल’ का है तो अदृश्य ताकतों (बाज़ार आदि  से जूझना पड़ सकता है ,पर ‘भूख’ का स्वरूप तो वही रहना है ऐसे में  इसकी सार्थकता और बढ़ जाती है .
 *फोटो  सूडान अकाल १८९४  गूगल  से साभार