Saturday, September 30, 2017

‘नव कविता की कसौटी पर कवि सुधाकर पाठक की कृति’

                                  


            अपने पहले ही कविता संग्रह "जिंदगी कुछ यूँ ही" से नव कविता लेखन में कवि सुधाकर पाठक ने अपनी उपस्थिति दर्ज़  करवाई है  संग्रह की  अधिकतर कविताओं पर संस्कार हावी हैं।यहाँ मुक्ति की चाह तो है, पर छटपटाहट नहीं। जीवन को भरपूर जीते हुए भी कविता इसी जीवन के दायरों में रहकर सायास हुई है। इनकी कविता ने जीवन के हर एक पहलु को छुआ है जिनमें कुछ  पहलु उभरकर कविता की मुखर आवाज़ बने हैं।     

सहजता इस संग्रह का प्रमुख गुण कहा जा सकता है जहाँ बिना किसी लाग लपेट के जीवन के 'सबकुछ' का छूटा हुआ 'कुछ' पाने की आशा मुखरित हुई है। घनानंद के यहाँ भी प्रेम मुख्य विषय था पर वहां इसकी  जैसी गंभीरता निरूपित हुई की प्रेम विषयक कविता मेंहृदयगत भावों’ के सच्चे उदगारों की उपस्थिति अनिवार्य  हो गयी।पर आज प्रेम का स्वरूप बदलने के साथ क्या उसके भाव और अर्थ भी बदल गए हैं ? या प्रेम महज एक विषय भर रह गया है, जिसे तनाव के समक्ष आसानी से खड़ा किया जा सकता है ?

निजता की प्रचुर मात्रा कई बार कृति की सार्वभौमिकता को प्रभावित करती है। यहाँ बड़ी संजीदगी से जीवन को शब्दों के जरिये कविता की शक्ल में रखा गया है। जहाँ कवि अपने युगबोध से तो परिचित है पर 'सच्ची कविता ' के मर्म से अनभिज्ञ जान पड़ता है। लेकिन  यहाँ भी जो है उसमे कविता की निजता वाली विशेषता के साथ उस 'आधुनिक युवक ' की उपस्थिति है जो छायावाद की आत्मीयता वाली 'मैं शैली' में थी।और जो प्रथम पुरुष के रूप में खुद को अभिव्यक्ति देने की चाह रखता था। यहाँ उसने वह कर दिया है। पर पाठक कहाँ तक उस व्यक्ति में स्वयं का अक्ष देख पाता है यह देखने वाली बात है।

संग्रह की प्रेम विषयक कविताओं की जितनी सफलता कही जायेगी वो परम्पराओं से खाद-बीज लेने के चलते प्रेम में प्रेरणा के तत्व को पकड़ पाई है। फिर चाहे कालिदास हो या तुलसीदास अथवा 'प्रेरणा' हो या 'चोट' अमर वहां प्रेम को ही समझा गया है।

"अब जान पाया हूँ मैं /कालिदास के /कालिदास बन पाने का मर्म /बस प्रेरणा चाहिए।" 

ये कुछ-कुछ उसी तरह है जैसे हाल ही की एक फिल्म में नायक को 'रॉकस्टार' बनने के लिए नायिका के रूप में दिल तोड़ने वाली मशीन चाहिए। जहाँ नायिका और मशीन एक ही लड़की है। वहीँप्रेरणा’ औरचोट’ भी एकमेक हैं।और अंततः उभरकर विषय के रूप में प्रेम ही आता है

संग्रह की कविता 'मेरा जीवन' पाठक से दार्शनिक विवेक की मांग करती है।  सिद्धांत के अभाव का ही परिणाम होता है की कई बार साधारण ढंग से की गयी कविता भी असाधारण बन पड़ती है।  अच्छे में कुछ जोड़ा जा सकता है  तो रचनाओं का समयानुकूल होना। जो की पाठक को यथार्थ की जमीन पर रखता है इधर उधर भटकने नहीं देता।
कवि ने तत्कालीन समय की वस्तुस्थिति को ठीक से जांचते-परखते हुए कविता में रखने का प्रयास किया है-

"प्रगति लील गयी है 
मेरी गति को ,
पहले गति थी तो प्रगति नहीं थी, अब प्रगति है पर गति नहीं है।"

बहुत समय पहले भविष्य के लिए चेताते हुए एक वैज्ञानिक ने कहा था। आज मनुष्य तकनीक को वश में करके अपनी सुविधा के लिए उसका उपयोग कर रहा है वह दिन दूर नहीं जब तकनीक मनुष्य को अपने कब्जे में करने लगेगी।  जिसके संकेत आजकल दिखने लगे हैं, जो कविता में उभरकर आते हैं।  

'कोल्हू का बैल' कविता में वास्तविक भावों की परिणीति हुई है। जिससे पाठक खुद खुद कृति से जुड़ जाता है।और यही कविता की सामाजिकता एवं रचना की सार्थकता को बचा ले जाती है।

यदि कविता के इस फूहड़ दौर के कवि और कविताओं के बरक्स रखकर देखें तो संग्रह कवि की संजीदगी से परिचय करवाता है, पर कविता का सिर्फ  'डीसेंट' होना क्या अपने सच्चे अर्थों में कविता होना है ? या इससे भी इतर कुछ 'और' है ? कवि के यहाँ सब-कुछ का 'सब' पाने के बाद छूटा हुआ 'कुछ' ही संग्रह की परिणीति है।

 संग्रह में जहाँ 'बलवती आशा' हर मोड़ पर उपस्थित है। वहीँरुचि’ वाला तत्व कई पड़ावों से अदृश्य है। जो शायद पठनीयता की पहली शर्त है।  तत्पश्चात ही कुछ 'और' होने की अपेक्षा कविता से की जा सकती है।  अधिकतर कविताओं में सहजता जो की गुण माना जाता है पर बिम्बों की क्षीणता से  चित्रात्मकता कविता से  गायब हुई प्रतीत होती है। कविता पढ़कर मन में यदि तस्वीरें नहीं बने या चित्र नहीं उभरें तो कविता कौनसे रास्ते  से पाठक के अंतर्मन तक पहुंचेगी ? यह सोचने वाली बात है।


'जो है उससे बेहतर चाहिए' की आस में कविता पड़ाव दर पड़ाव मजबूती से कदम बढाती है-

उस पड़ाव पर /जब /समझ आता है /इससे और बेहतर तरीके से भी तो /जिया जा सकता था इसे

यह जिजीविषा ही है, जिससे कविता जीवंत बन पड़ती है। इस बेहतर के लिए कवि भले ही कोई मार्ग नहीं दिखाता लेकिन यथास्थिति से अवगत जरूर करवाता है  जो बोध होने की सार्थकता को दर्शाता है  इसी बोध के चलते जीवन की उहा-पोह में भी कवि बार -बार पीछे मुड़ कर  देखता है और पुरानी चीज़ों के जरिये अपनी परम्पराओं तक पाठक को ले जाने में सफल हो पाता है।  
संग्रह के प्रशंसा वाले तीसियों पन्ने किताबों की हाल की दशा का ब्यौरा देते हैं। ये प्रशंसा भरे पृष्ठ कृति के सुधि पाठक को भ्रमित कर उसका संदेह ही बढ़ाते हैं। जिससे वह यह सोचने पर भी मजबूर हो सकता है, की इसमें है तो बहुत कुछ ! बस उसे ही समझ नहीं आया। कविता की देहरी पर 'जिंदगी कुछ यूँ ही' के जरिये कवि का पहला कदम है आगे के क़दमों से 'सच्ची कविता' की दरकार है।


                                                                    -  राकेश बाजिया