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बिना भुने
धीमी आंच पर पंद्रह साल तक जो पका है वह हाइवे के रूप में दर्शकों के सामने है। आलिया भट जंहा अपने दूसरे
ही प्रयास में सम्भावनाये छोड़ती नज़र आती हैं , वंही रणदीप
हुड्डा ने खुद को पूरी तरह किरदार में ढाल लिया है दरअसल साधारण से
नज़र आते फ़िल्म के किरदार पूरी सहजता से परदे पर आते हैं और फ़िल्म कि
कहानी कुछ इस तरह आगे बढ़ती है , कि दर्शक स्वयं को इसके चरित्रों के आस पास
पाते हैं। और शायद यही वजह है कि शुरुआत से ही फ़िल्म के नायक-नायिका परिचय के मोहताज़ नहीं। फ़िल्म के निर्देशक
इम्तियाज अली
ने इस फ़िल्म के जरिये समाज के बिलकुल ऊपरी और निचले तबके के बहुत से पक्षों को उजागर किया है। यह बिलकुल धरती और आसमान
के मिलने जैसा है जो कि दूर से देखने पर क्षितिज का आभास कराता है। पर ऐसा होता नहीं ! हाँ
मगर इंसान कि
आत्मिक समझ और भावनाओं के चलते कुछ भी सम्भव है। अगर ऐसा नहीं है तो बल यौन शोषण कि पीड़ा
मासूम वीरा कैसे महावीर जैसे अपराधी के सामने बयां करती है ? और महाबीर जो हर बार उसे बोलने से पहले ही डांट देता है। किस मौन से सुनता और महसूस
करता है ?
वास्तव में
फ़िल्म का नायक महावीर (रणदीप हुड्डा ) जिस पृष्टभूमि से है , दरअसल यह वहाँ कि बहुत बड़ी समस्या है इसलिए यह अकेले महाबीर की न होकर बहुत से युवाओं कि
समस्या है , किसान से मजदूर बने माँ बाप और बचपन से यह सब
देखती उनकी संतानें समझदार बन्ने से पहले अपराधी बन जाती हैं , जिनका घिनौना अंत है , वह भी उसी व्यवस्था के
द्वारा जिसने उन्हें अपराधी बनने को मजबूर किया।
फ़िल्म की नायिका वीरा (आलिया भट्ट ) जिस "'क्लास'' (वर्ग) से है वहाँ के बनावटी जीवन से वह ऊब चुकी है , इसी के चलते खामोशियों के बीच खुद को तलाशने कि कोशिश वह जारी रखती है जिसे नदी के किनारे चट्टान पर
चुपचाप बैठी वीरा के माध्यम से लहरों के जरिये वीरा के अंतर्मन में चल रहे तूफ़ान को बिना शब्दों के बयां करने में इम्तियाज़ पूरी
तरह सफल रहे। फ़िल्म का संगीत पक्ष तब महत्वपूर्ण हो
जाता है जब लोकसंगीत कि झलकियों से लेकर लोक कि लोकेशन पर फिल्माए रहमान के गाने फ़िल्म को रफ़्तार दें , अली अली …… रागणी और माही वे … जैसे गानों से मानो पूरी ताजगी से हाइवे देशी लोकेशन से गुजरती हुई मसला
फिल्मों के लिए प्रतिरोध रचती नज़र आती है।
फ़िल्म में
सहज गुदगुदाने वाले दृश्य अपनी सहजता के चलते
महत्वपूर्ण हो जाते हैं खासकर "आड़ू" (गंवार) जिसका नाम ही उसके चरित्र को साझा करता है, सही में यह गंवार लोगो कि विश्वसनीयता कि और संकेत करता है। आड़ू अपने हर संवाद के
जरिये सच्ची चारित्रिक छाप छोड़ता है , एक अंग्रेजी गाने पर उसका
देशी नाच अपने खास देशीपन कि वजह से लोटपोट कर देता है।
संवादों कि बुनावट उनके कहने के सरल ढंग के कारण स्वतः ख़ास हो जाती है। … गोली चलने से एक नहीं दो लोग मरते हैं .... कुत्ता कुत्ते कि मौत ही मरेगा … जैसे संवादों के जरिये महाबीर अपनी पूरी व्यथा कह देता है।
जहाँ से
तुम मुझे लाये हो वहाँ मैं वापस जाना नहीं चाहती … जहाँ ले जा रहे हो वहाँ
पहुचना नहीं चाहती … बस ये रास्ता कभी खत्म न हो ! जैसे संवाद वीरा में निर्णयात्मक क्षमता का चरमोत्कर्ष है।
हाँ मगर महाबीर के व्यवहार को सतही तौर पर देखने वाले समीक्षक इसे "'कैद में मुक्ति ढूढ़ने का प्रयास" मान सकते हैं।
कई खामियों
के रहते भी हाइवे देखने के बाद यह विश्वास और दृढ हो जाता है कि निहायत जरूरी
विषय की संवेदनशील प्रस्तुति इम्तियाज कि विषेशता है। हो सकता है दर्शक भी इसे
देखने के बाद जान पाये कि वे खुद कितना 'सेंसिबल' हैं ?
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