विद्यालय में सबका अपना संगठन और यूनियन है .
चाहे वह शिक्षक हो या शिक्षामित्र . सब अपने –अपने हितो को लेकर न्याय और इंसाफ की
मांग संसद से लेकर सड़क तक उठाते रहते है . लेकिन इनका न तो कोई संगठन है और न ही
कोई न्याय पाने का रास्ता इन्हें पता है . आधारभूत आंकलन के दौरान एक साथी ने बताया कि जब वे विद्यालय गए तो
सर्वप्रथम खाना बनाने वाली बूढी महिला गेट
पर आई और उनको अधिकारी समझकर बोली 'साब' हमारा मानदेय बढ़वा दो, बहुत
समय से मानदेय नहीं बढ़ा है . इन उदाहरणों से पता चलता है कि वह अंदर से कितनी
व्यथित है किन्तु बच्चों से भोजन मन्त्र बुलवाने वाले हमारे शिक्षक भी भोजन माता
की पीड़ा और समस्या से परे है . आज तक मैंने किसी भी प्रशिक्षण या कार्यशाला में
समस्या की लम्बी फेहरिस्त बताने वाले किसी
शिक्षक को शायद ही भोजन माता की समस्या को उठाते हुए सुना हो . उल्टे मध्यान्ह
भोजन को बंद कराने की वकालत जरुर करते हैं . जिस मध्यान्ह भोजन को लेकर शिक्षक भले इतना
विवाद खड़ा करते हो लेकिन विद्यालय जाने के बाद देखकर नहीं लगता है कि ‘मध्यान्ह
भोजन’ भी सीखने –सिखाने में कोई समस्या है . एक तरफ भोजन बनता रहता है दूसरी तरफ
बच्चे पढ़ते –खेलते रहते है ,खाना खाने के बाद फिर आराम से अपने –अपने कामों में लग
जाते है . वास्तविकता तो यह है कि शिक्षक भी मन से नहीं चाहता है कि मध्यान्ह भोजन
खत्म हो क्योंकि इसकी आड़ में अपनी कमजोरियों को छिपाने का आसान रास्ता है वरना क्या गारंटी है कि जहाँ भोजन नहीं बनता वहाँ
सीखने –सिखाने का स्तर ऊँचा है . दूसरी
सच्चाई यह भी है कि इसके खिलाफ वही शिक्षक बोलते रहे हैं जो नहीं जानते कि भूख की
पीड़ा क्या होती है . यह वही भारत है जहाँ सोमवार को बच्चा अधिक खाता है क्योंकि
रविवार को स्कूल की छुट्टी होती है और घर
पर भी खाना मयस्सर नहीं हो पाता है . इन
बच्चों के प्रति वे क्या –क्या उपमाएं देते है यह किसी से छिपा नहीं है .
बात भोजन माता की हो
रही थी .और उनके मेहनत बनाम मानदेय की बात कर रहा था . कहीं –कहीं मैं ऐसे
विद्यालयों में गया हूँ जहाँ पर कई शिक्षक –शिक्षकाएं अपना समय सिर्फ बातों में गुजार लेते हैं या तबियत हुई तो एकाध क्लास भी ले लेते हैं . उन्हें भोजन माता को चूल्हे के धुएं से जूझते हुए चावल फटकते देखकर भी कर्तव्यबोध नहीं हो पाता . जहाँ वह हजार
रूपये पाकर भी ईमानदारी और मेहनत से काम कर रही है . वहीँ हम अख़बार में इस उम्मीद से आँखे गड़ाए हुए है कि सातवां वेतन कब लागू होगा .
इस प्रकार का शोषण और अन्याय
किसी निजी जगह पर भले सामान्य लगे किन्तु सरकार जो बराबरी का दावा करती है ,वहां पर इस तरह का अन्याय हमारी व्यवस्था की पोल
खोलता है . इसमें कार्य के प्रति लैंगिंग असमानता भी झलकती है .इतने कम वेतन में
शायद कोई पुरुष इतना देर तक इस तरह के काम करने को तैयार हो किन्तु महिला के श्रम
को जिस प्रकार घरों में आंका जाता है वही आकने का पैमाना सरकार का भी है . आधारभूत आंकलन के दौरान प्रारूप में बच्चे की सामाजिक आर्थिक स्थिति जानने का एक कॉलम था –तुम्हारी माँ
क्या काम करती है ? ज्यादातर बच्चे बोल देते थे कुछ नहीं करती . इसमें यह छिपा हुआ
है कि काम तो वही होता है जो खाना बनाने- खिलाने के अलावा हो . मैं यदि कहता मान
लो तुम्हारी माँ घर पर एक दिन का भी हड़ताल कर दे तो क्या तुम इतने अच्छे से स्कूल
आ पाते .बच्चे शरमाकर अपनी गलती का अहसास करते थे .
इस तरह कह सकते हैं कि माता चाहे घर पर भोजन बनाए या बाहर उसकी मेहनत का मूल्य यही है .
समर्पित.....
उस भोजन माता को जिन्होंने पहली –पहली बार विद्यालय जाने पर
मना करने के बावजूद माँ की तरह अपने खुरदुरे हाथों से खाना परोस दिया था, किन्तु
स्कूल विलय होने के बाद वह न जाने कहाँ जूझ रही होंगी.
*हाल ही में बहुत से प्राथमिक स्कूलों को छात्र /छात्राओं के
आभाव में माध्यमिक विद्यालयों के साथ मर्ज कर दिया है.
जितेन्द्र यादव
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ,वाराणसी से स्नातकोत्तर हैं .आजकल शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत हैं . jitendrayadav.bhu@gmail.com



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