Thursday, May 28, 2015

डिड यू डू इट...???

         बचपन में टिटहरी के बारे में सुना था यह कभी दोनों पांव जमीन पर नहीं रखती गर रख दे तो प्रलय आ जाएगी . इसी  टिटहरी की आवाज़  जो सुनने में कुछ इस सवाल की तरह ही लगती है को बच्चे के सवालों के साथ इस तरह गुंथा है जिसे पढ़ते हुए अनायास ही अपने बचपन का भ्रमण कर आते हैं .



                           

कल रात जब हम छत पर टहल रहे थे तो हमने टिटहरी  की आवाज़ सुनी, सर उठा कर देखा तो काले आसमान में सफ़ेद सा धब्बा दिखा और उसके पीछे पीछे बहुत दूर तक चले गए......
एक छोटा सा बच्चा, आम सा, स्कूल पहुँचने वाला है, कुछ होमवर्क पूरा नहीं है शायद, दिमाग़ में टेंशन है, क्या बहाना बनायेंगे ? क्या कहेंगे ? काश काम कर लिया होता, या फिर स्कूल ही न आये होते . अल्लाह!! ये स्कूल क्यूँ बनाया ! बार बार ख्याल आ रहा था . ये सब सोचते सोचते प्रार्थना स्थल  पहुँचा, कुछ बच्चे खेल रहे थे, कुछ बातें कर रहे थे, सब अपने में मस्त, तभी घंटी बजी और सब लाइन बना कर खड़े हो गये .  अभी हेड मिस्ट्रेस नहीं आयीं थीं, तभी ऊपर से दो टिटहरियाँ शोर मचाते हुए  गुजरीं  और इमली के पेड़ पर बैठ गयीं , अचानक बच्चे का ध्यान भटक गया और घर पहुँच गया .
“देखो 8 बज गए हैं, मम्मी स्कूल जाने के लिए तैयार हो गयी होंगी, लाला चाय पी रही होंगी, दादी अम्मी शायद कुरान पढ़ रही हों,चाचा लोग तो शायद अभी सो रहे हों, मेरी फ़िक्र किसी को नहीं है, कितना मना किया था प्लीज आज स्कूल मत भेजिए, कल हम ज़रूर जायेंगे, मगर नहीं, ज़बरदस्ती भेज दिया . भय्याजी का भी आना भी ज़रूरी था? अरे एक दिन न आते तो पैसे थोड़ी कट जाते .”
ये सब सोचते हुए  नज़र आसमान पर चली गयी, सूरज चमक रहा था, कुछ टुकड़े बादल के थे, दिमाग़ फिर पलट गया...
“पता नहीं ये बादल घर के आसमान पर भी होंगे या नहीं ? छत से तो ज्यादा दिखता नहीं, हाँ शायद सीढ़ी वाली छत से दिख जाए .  पता नहीं घर में कहाँ-कहाँ धूप आ गई होगी? यहाँ तो पूरे में धूप है .”
तभी पीछे से पुलक टंडन ने धक्का दे कर कहा “आगे बढ़ो ” हेड मिस्ट्रेस आ गयीं थीं .
     प्रार्थना शुरू हो गई और एक छोटे से बादल  ने सूरज को ढक लिया और बच्चे का दिमाग़ फिर बादलों पर सवार हो गया मगर इस बार लखनऊ में नहीं रुका . “ बाबा पता नहीं क्या कर रहे होंगे ? बम्बई में बादल तो ज़रूर होंगे मगर क्या बाबा बादल देख रहे होंगे ? वहां छत तो है नहीं, मगर बालकनी तो है वहां से तो देख ही सकते हैं !” फिर ख्याल आया के बालकनी में तो सड़ी मछली की बू आती है इसलिए बंद रखनी पड़ती है, हाँ एक बात है पता नहीं खाड़ी में कितना पानी भरा होगा ? बम्बई में होते तो देख पाते .
“लखनऊ में समंदर नहीं तो कोई बात नहीं, मगर खाड़ी तो ज्यादा जगह नहीं घेरती फिर भी लखनऊ में नहीं है, क्यूँ ? बाबा भी शायद मेरे बारे में सोच रहे हों, खैर एक महीने की तो बात है, अभी दिसंबर में तो जाना ही है,” मगर आज क्या करेंगे?? दिमाग वर्तमान  में आ गया, मैम खान का होमवर्क !!!
प्रार्थना  ख़त्म हो गयी थी, मैम शिमलाई  कह रहीं थीं बच्चों जैसा की आप सब जानते हैं खेलकूद प्रतियोगिता के लिए हमारे पास सिर्फ एक दिन बचा है इसलिए हम आज शुरू की पूरी चार घंटी  पोलो मैदान में तैयारी करेंगे
बच्चे के होटों पर मुस्कराहट दौड़ गयी,  मैम खान  का तीसरा पीरियड था न 'अल्लाह का शुक्र है' घर जाके सबसे पहले काम करेंगे, फिर खाना खायेंगे .
एक ठंडी हवा का झोंका हमें फिर से अक्सा कालोनी में ले आया और ऊपर से एक और टिटहरी  उड़ती हुई गई . उसका आज भी हमसे यही सवाल था
डिड यू डू इट...?...डिड यू डू इट...?” 



         



                          
           आली रज़ा

        लेखक घुमक्कड़ खांटी लखनवी हैं 

                   9950462457

No comments:

Post a Comment